Friday, December 10, 2010

छलाँग

शायद ,
मैंने कभी किसी से प्यार किया ही नहीं
जिसे समझा था प्यार
वो तो प्यार था ही नहीं

फिर मैं रातों में क्यों जागती रही
झूठे सच्चे सपने सजाती रही
मन मेरा मुझ पर हँसता है
नादान,
तू अब भी ना समझ पाई

मुट्टी में सोना समझकर थी तूने रेत पकड़ी
खुली मुट्टी बिखर गया रेत
रह गई खाली हथेली
पहरेदारी कर रही थी तू उस घर की
जिसमे कोई रहता ना था
कागजों के महल बना रही थी
आग लगी और बस राख रह गई
जब कुछ था ही नहीं एक वहम के सिवा
तो इतना हल्ला गुल्ला क्यों मचा रही है

तू अपने आप से भाग रही थी
अपनी ही परछाई से डर रही थी
कभी गले लगा तू अपनी परछाई को
पूछ उसका हाल चाल भी

मैं हाथ पकड़कर अपनी परछाई का
जैसे ही दो -चार कदम चली
सारी दुनिया ही उल्ट-पुलट हो गई
बाहर से ज्यदा,
मेरी नज़र अपने अन्दर जाने लगी

हर रोज,
मैं अपने कमरे की सफाई करती हूँ
नीले रंग के परदे लगा रखे हैं
लाल रंग की कारपेट बिछा रखी है

लेकिन अन्दर,
अन्दर के कमरे की तो मैंने कभी सफाई की ही नहीं
ना उसे रंगों से सजाया कभी
अन्दर के कमरे में झाँका तो जाना
वहां तो मकड़ी के बड़े बड़े भयंकर जाले लगे थे
जाने कितने जन्मों से उन्होंने मेरे कमरे पर कव्जा जमा रखा था
वो जाले मेरे अन्दर थे मेरा हिस्सा थे
ना उन्हें अनदेखा कर पाती
ना उन्हें देख ही पाती

शायद ,
खुदा मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरवान रहता है
जब भी डूबने वाली होती हूँ
ठीक डूबने से पहले बचा लेता है
आकर उसने सपने में एक मंतर दे दिया
जब भी मिले फुरसत आँख बंद कर लेना
मगर याद रहे ,
आँख बंद करनी है सो मत जाना
जाले अपने आप झड़ जायगे
थोड़ी सी तकलीफ होगी तुझे
दुनिया थोड़ा सा पागल समझेगी तुझे

मंतर काम कर गया
जाले झडे तो कमरे में रोशनी आने लगी
दुनिया से ज्यादा अपनी फिक्र सताने लगी
आधी ज़िन्दगी कट गई है दुनियादारी निभाते निभाते
दुनियादारी खुबसूरत है , आकर्षक है
पर बहुत हलकी और कच्ची है
एक हवा के झोके के उड़ जायगी सारी दुनियादारी

अब ज़िन्दगी की सौदेबाजी ही करनी है दोस्तों
तो थोड़ी परिपक्व और भारी वस्तु से कर लेती हूँ
थोड़ा सा साहस बटोर लेती हूँ
घबराहट को सुबहे की चाय के साथ पी लेती हूँ
अपने डरे से दिल को गले लगाकर मना लेती हूँ
जिस भीड़ से तू अलग होने से डरता है
वो कुछ अजनबी लोगों का जमघट है
इससे ज्यदा कुछ नहीं
क्यों तू छोटी छोटी बातों में इतना उलझा है
लोग क्या कहेंगे
इस दुनिया के इतिहास में ,
तेरा कोई नामों निशा ना होगा
तेरा अपना कोई आशियाना ना होगा
इन सब का कोई मोल नहीं है

अब तो बंदरों ने भी छोड़ दिया है नक़ल करना
तू कब छोड़ेगा दूसरों की तरह बनना
किसी भी दिन आकर, यमराज
तेरे घर की घंटी बजा देगा
तू मखमली चादर में लिपटी सोई हो
या फिर सूती कपड़ा लपेटा हो
वो तुरंत इस दुनिया से तेरी बिदाई करा देगा

कब तक घबराहट से भरी , डरी सहमी ज़िन्दगी जियेगी
खुला आसमान तेरा इंतज़ार कर रहा है
अब अपने घोंसले से निकलकर पंख फैला भी दे
अगर भरोसा नहीं है खुद पर ,
तो खुदा पर भरोसा करके,
एक बार इस घोंसले से छलाँग लगा भी दे

3 comments:

  1. अच्छा प्रयास...

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  2. Thanks Veena ji.. pryaas dheere dheere safal bhi ho jaayega :-)

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