Tuesday, September 20, 2011

You make me feel complete...

I waited for you very long
Nobody has ever
...ever...
looked at me as you do
You make me feel so complete

I don't know our future
But I will never be empty again
Your eyes will be looking at me all the time
They will bring light in darkness
They will make me laugh in sadness
They will give hand when I fall
I will never be alone again
I don't know what destiny holds for us
But you are my last destination
I feel I have come home being in your arms
My search ended in your heart
you make me feel so complete

I have no desire for heaven
I have no desire for fame and name
You hold my hand and walk with me till the end
What else I need to smile in my life
you make me feel so complete

Its not passion,Its not emotion
Which will disappear with the time
Its my eternal love for you
It will grow higher and deeper every moment
You make me feel so.. so..complete
You make me feel so.. so..complete

Monday, September 12, 2011

महबूब मेरे

तू खुदा बन गया है मेरा
तुझे मुहब्बत करना मज़हब मेरा

तेरी आँखों में अपनी तस्वीर झाँक कर जागूँ
तेरी बाँहों में लिपट कर हर रात गुजारूं

ज़हर भी दे दे कोई तेरा नाम लेके
मुस्कुराके होठों से उसे चूम लूँ

तूने पूरा कर दिया है मुझे
अपना हमसफ़र बनाके
अब आ जाए मौत भी
तो मैं कोई सिकवा न करूँ

कहने दो करने दो ज़माने की जो मर्जी हो
लगाने दो बदनामी के दाग भी जो लगाने हो
मैं उफ़ तक न करूँ

गिरा दूं हर पर्दा
मिटा दूं हर दूरी

लुटा दूं अपनी हस्ती
करूँ हदें पार सारी
करूँ हदें पार सारी तेरी बंदगी में महबूब मेरे

Friday, August 12, 2011

शब्दों का ताना-बाना

शब्दों का ताना-बाना बुनते बुनते
मैं भूल ही जाती हूँ कि मैं हूँ कौन
भारी भरकम शब्दों से खेलने की आदत
लोगों से प्रशंसा सुनने की भूख
मुझसे बार बार झूठ बुलवा देती है

विचारों की लड़ियाँ कहाँ दम तोड़ती हैं
भावनाओं का समंदर कहाँ शुरू होता है
इसका एहसास ही नहीं रहता
विचारों और भावनाओं के झूले में
कभी इस छोर कभी उस छोर डोलती रहती हूँ
बीच से कहीं कुछ आधा अधूरा सा चुराकर
शब्दों का एक महल बनाती हूँ
जहाँ सच और झूठ में फासला नहीं रहता
कभी खुल जाये आँख गहरी नींद से
और ढह जाए शब्दों का महल
तो किसी कोने में बैठकर रो लेती हूँ

हे ईश्वर
इन शब्दों ने मुझे छली बना दिया
जो है वो ये कहने में असमर्थ
जो है नहीं
उसे कहने में इन्हें महारत हासिल
इनकी सुन्दरता इतनी अदभुत
कि मैं अपना होश खो बैठती हूँ
और सकपकाई सी उनके जाल में
हर रोज थोड़ा और फंसती जाती हूँ

अजीब बिडम्बना है
शब्दों द्वारा शब्दों से परे जाने की कोशिश
शब्दों की चौड़ी सी दीवार
मेरे और सच के बीच
जिसे मैं लांघ नहीं पाती
बार बार रास्ता भटक जाती हूँ
शब्दों का शोर ऐसी आंधी पैदा करता है
कि मेरे होश का दीपक बुझ जाता है

हे ईश्वर
कोई राह दिखा मुझे
शब्दों के कपट से तू ही बचा मुझे
लोगों से प्रसंशा सुनने की भूख से
थोड़ा सा ऊपर उठा मुझे
अपने ह्रदय का गान गा सकूँ
छल कपट झूठ के जाल से मुक्त रहूँ
इतना बुद्धिमान बना मुझे !

Monday, August 1, 2011

चेहरें...

रोज गुज़रते हैं
चेहरें हज़ार नज़रों के सामने से

कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ सर झुकाते हुए
कुछ की आँखों में रोशनी के दिए
कुछ सबसे नाराज से
कुछ नई ज़िन्दगी का स्वागत करतें
कुछ अर्थी को कन्धा देतें

रोज गुज़रते हैं
चेहरें हज़ार नज़रों के सामने से

हर चेहरे में बसा है एक संसार
उसकी अपनी भाषा ,अपना भगवान्
चुप हैं फिर भी कुछ कहते से चेहरे
अपने अपने ख्वाबों को सच करने में लगे हुए चहरे
जाने कहाँ पहुचेंगे ये चेहरे

रोज गुज़रते हैं
चेहरें हज़ार नज़रों के सामने से

(I feel its incomplete ... but if I add anything to it, it will loose the meaning.)

Thursday, July 28, 2011

मैं

मैं मैं जैसी अच्छी,
मुझे तुम जैसा बनना क्यों ?
अगर हो गई तुम जैसी,
तो फिर मेरा होना भी क्यों ?

मुझे स्वीकार गुन-अबगुन अपने,
स्वयं को दुकड़ों में बांटना क्यों ?
नहीं है मेरा सत् इतना भी घृणित,
उसे ओढ़नी से ढांकना क्यों ?

English Translation

I am perfect as I am. Why should I be like any other person in the world?. If I become like any other person, then why should I even exist?. The other person is already there.

I accept my greatness and weakness with same love, Why should I divide my own self into parts? My real nature can't be so ugly/horrified. why should I hide it behind mask.

बैरी मन

पिया तेरा मन मुझसे बैर करे हैं
बिना वजह व्यंग कसे है

चाहे तो समझा अपने बैरी मन को, तुने ही नहीं
मैंने भी गवाया है खुद को , इस पथ पर

चाहे तो झटक दे कलाई मेरी, बीच दरिया में
लौट जा किनारे, फिर दर्शक बनने

मुझे तो शौक है दरिया का
डूबूं या उभरू,पार तो जाना ही होगा

Wednesday, July 27, 2011

पिया जी ...

शब्दों का मेला खड़ा अकेला
राहों में तेरी पलकें बिछाए

प्रीत ये कैसी तेरी पिया जी ..
दूर रहकर भी दूर रहो न तुम

मैंने ही मांगी थी तुमसे ये दूरियाँ
अब मन हर आहट पर दहल रहा है

झगड़ कर आंसु आँख से झलक गया है
मेरी शिकायत करने के लिए तुझे ढूंढ रहा है